
बिहार के गया जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर व जगंल-झाड़ के बीच बसा डुमरिया-इमामगंज भारत के अन्य क्षेत्रों से कई मायनो में अलग है।
चारो ओर पहाड़ियों से घिरा गांव- पथलधसा। नक्सल प्रभावित क्षेत्र। 30 परिवार वाले महादलितों के इस गांव में पढ़ाई- लिखाई की कवायद आज भी काठ है। एक भी स्कूल नहीं। नतीजा- गांव के मात्र दो पुरुष और एक महिला ही अपना नाम लिख पाती है। बाकी सब के सब अंगूठा छाप।
गया जिले से लगभग 70 किमी. दूर शेरघाटी अनुमंडल के इमामगंज प्रखंड में है यह पथलधसा गांव। इमामगंज में तो महिला और पुरुषों को साक्षर बनाने के लिए रात्रि पाठशाला तक संचालित की गयी है। महादलित विद्यालय भी है। लेकिन प्रखंड मुख्यालय से लगभग 25 किमी. दूर जंगल में बसे पथलधसा गांव में ककहरों तक की गैर जानकारी ही ठठा रही है।
बस जगदेव सिंह भोक्ता, मुंशी सिंह भोक्ता और सूरजकली देवी ही अपना नाम लिख पाती हैं, किसी तरह। गांव में तकरीबन 350 लोग हैं। फिलवक्त गांव के 80 बच्चे पढ़ना चाह कर भी मजबूर हैं। गांव से स्कूल बहुत दूर है। प्राथमिक विद्यालय सात किमी. दूर है। अभिभावकों का चिंतित होना स्वाभाविक है। उनका सपना बच्चों को पढ़ा- लिखा देखने की है। क्षेत्रीय संकुल संसाधन केन्द्र के साधन सेवी नकुलदेव प्रसाद बताते हैं कि गांव में स्कूल खोलने के लिए बिहार शिक्षा परियोजना को लिखा गया है। ग्रामीण कहते हैं कि अगर गांव में स्कूल खोल दिया जाए तो बच्चे स्कूल जाना भी शुरू कर देंगे।
पथलधसा के ग्रामीणों के पास अपना कुछ नहीं है। जमीन की बंटाईदारी पहाड़ी की तराई में करते हैं जिससे उनके परिवार का गुजारा होता है। इनके पास सामर्थ्य नहीं है कि बच्चों को कहीं बाहर भेजकर पढ़ा सकें। बच्चे गाय, बैल, बकरी, सूअर चराते हैं और जंगली फल चुनकर बाजार में बेचते हैं।
मजे की बात तो सह है कि यह इलाका बिहार विधान सभा अध्यक्ष उदयनारायन चौधरी का है। इसके बावजूद आज भी यहां के लोग बाहरी दुनिया से कटे हुए है। खौफ के साये में यह इलाका अब अंगड़ाई ले रहा है। क्षेत्र के लोगों में एक अलग तरह का बदलाव देखा जा रहा है। मानो इलोक में नई बयार बह रही है। इस इलाके ने तमाम आशंकाओं को झुठला दिया है। अब लोगों के बीच खौफ के साये में बस, सुनते जाओं करते जाओं ही मात्र एक तरीका है।
दूसरी ओर एक कहावत है न- 'बशिंदे चाहे कितनी भी हो मगर आदतें नहीं छूटती'। लेकिन देश का एक क्षेत्र ऐसा भी है जहां लोग आतंक के साये में धीरे-धीरे अब अपने अभिवादन के तौर-तरीके को बदलने को मजबूर हो रहे हैं।
फोटो गूगल
चारो ओर पहाड़ियों से घिरा गांव- पथलधसा। नक्सल प्रभावित क्षेत्र। 30 परिवार वाले महादलितों के इस गांव में पढ़ाई- लिखाई की कवायद आज भी काठ है। एक भी स्कूल नहीं। नतीजा- गांव के मात्र दो पुरुष और एक महिला ही अपना नाम लिख पाती है। बाकी सब के सब अंगूठा छाप।
गया जिले से लगभग 70 किमी. दूर शेरघाटी अनुमंडल के इमामगंज प्रखंड में है यह पथलधसा गांव। इमामगंज में तो महिला और पुरुषों को साक्षर बनाने के लिए रात्रि पाठशाला तक संचालित की गयी है। महादलित विद्यालय भी है। लेकिन प्रखंड मुख्यालय से लगभग 25 किमी. दूर जंगल में बसे पथलधसा गांव में ककहरों तक की गैर जानकारी ही ठठा रही है।
बस जगदेव सिंह भोक्ता, मुंशी सिंह भोक्ता और सूरजकली देवी ही अपना नाम लिख पाती हैं, किसी तरह। गांव में तकरीबन 350 लोग हैं। फिलवक्त गांव के 80 बच्चे पढ़ना चाह कर भी मजबूर हैं। गांव से स्कूल बहुत दूर है। प्राथमिक विद्यालय सात किमी. दूर है। अभिभावकों का चिंतित होना स्वाभाविक है। उनका सपना बच्चों को पढ़ा- लिखा देखने की है। क्षेत्रीय संकुल संसाधन केन्द्र के साधन सेवी नकुलदेव प्रसाद बताते हैं कि गांव में स्कूल खोलने के लिए बिहार शिक्षा परियोजना को लिखा गया है। ग्रामीण कहते हैं कि अगर गांव में स्कूल खोल दिया जाए तो बच्चे स्कूल जाना भी शुरू कर देंगे।
पथलधसा के ग्रामीणों के पास अपना कुछ नहीं है। जमीन की बंटाईदारी पहाड़ी की तराई में करते हैं जिससे उनके परिवार का गुजारा होता है। इनके पास सामर्थ्य नहीं है कि बच्चों को कहीं बाहर भेजकर पढ़ा सकें। बच्चे गाय, बैल, बकरी, सूअर चराते हैं और जंगली फल चुनकर बाजार में बेचते हैं।
मजे की बात तो सह है कि यह इलाका बिहार विधान सभा अध्यक्ष उदयनारायन चौधरी का है। इसके बावजूद आज भी यहां के लोग बाहरी दुनिया से कटे हुए है। खौफ के साये में यह इलाका अब अंगड़ाई ले रहा है। क्षेत्र के लोगों में एक अलग तरह का बदलाव देखा जा रहा है। मानो इलोक में नई बयार बह रही है। इस इलाके ने तमाम आशंकाओं को झुठला दिया है। अब लोगों के बीच खौफ के साये में बस, सुनते जाओं करते जाओं ही मात्र एक तरीका है।
दूसरी ओर एक कहावत है न- 'बशिंदे चाहे कितनी भी हो मगर आदतें नहीं छूटती'। लेकिन देश का एक क्षेत्र ऐसा भी है जहां लोग आतंक के साये में धीरे-धीरे अब अपने अभिवादन के तौर-तरीके को बदलने को मजबूर हो रहे हैं।
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