Sunday, November 8, 2009

......मुरादें लिए आते हैं !!!!!



मन में साईं का नाम हो तो हर कष्ट दूर हो जाता है। साईं के नाम भर से ही हर अधूरा काम पूरा हो जाता है। जाके राखो साईंया मार सके ना कोय.....


वाईन कैपिटल आफ इंडिया....यानी .............नासिक से 65 किलोमीटर दूर शिरडी में एक ऐसा स्‍थान अब देवतुल्‍य बन चुका है जिसका 18 वीं सदी में कोई महत्‍व ही नहीं था। बाबा के धाम का दर्शन करने दूर - दूर से लोग मुरादें लिए आते हैं। शिरडी वाले साईं सबकी मुराद पूरी भी करते हैं। ऐसा लोगों की मान्‍यता है। मुंबई से नंगे पांव पैदल चलकर बहुत से भक्‍त बाबा का नाम जपते हुए ही इस धाम को आते हैं और हजारों लोगों के साथ घंटों लाईन में लगकर बाबा का दर्शन पाते हैं। जब बाबा इस दुनिया में थे तो वे अपने जीवन का उद्देश्‍य मानवता की सेवा बताते थे।

बाबा ने कहा था, ” मेरा उद्देश्य शिरडी को ऐसा स्थल बनाना है, जहां न कोई बहुत ज्यादा गरीब होगा, न कोई बहुत ज्यादा अमीर, ...। भक्तों को बाबा की कृपा पाने में कोई खाई, कैसी भी दीवार... बाधा नहीं बनती। बाबा कहते, मैं शिरडी में रहता हूं, लेकिन हर श्रद्धालु के दिल में मुझे ढूंढ सकते हो। एक के और सबके। जो श्रद्धा रखता है, वह मुझे अपने पास पाता है। “ साई ने कभी कोई भारी-भरकम बात नहीं की। वे भी वही बोले, जो हर संत ने कहा है, सबको प्यार करो, क्योंकि मैं सब में हूं। अगर तुम पशुओं और सभी मनुष्यों को प्रेम करोगे, तो मुझे पाने में कभी असफल नहीं होगे। यहां मैं का मतलब साई की स्थूल उपस्थिति से नहीं है। साई तो प्रभु के ही अवतार थे और गुरु भी, जो अंधकार से मुक्ति प्रदान करता है। ईश के प्रति भक्ति और साई गुरु के चरणों में श्रद्धा..यहीं से तो बनता है, इष्ट से सामीप्य का संयोग। दैन्यता का नाश करने वाले साई ने स्पष्ट कहा था, एक बार शिरडी की धरती छू लो, हर कष्ट छूट जाएगा। बाबा के चमत्कारों की चर्चा बहुत होती है, लेकिन स्वयं साई नश्वर संसार और देह को महत्व नहीं देते थे। भक्तों को उन्होंने सांत्वना दी थी, पार्थिव देह न होगी, तब भी तुम मुझे अपने पास पाओगे।



अहंकार से मुक्ति और संपूर्ण समर्पण के बिना साई नहीं मिलते। कृपापुंज बाबा कहते हैं, पहले मेरे पास आओ, खुद को समर्पित करो, फिर देखो..। वैसे भी, जब तक मैं का व्यर्थ भाव नष्ट नहीं होता, प्रभु की कृपा कहां प्राप्त होती है। साई ने भी चेतावनी दी थी, एक बार मेरी ओर देखो, निश्चित-मैं तुम्हारी तरफ देखूंगा। 1854 में बाबा शिरडी आए और 1918 में देह त्याग दी। चंद दशक में वे सांस्कृतिक-धार्मिक मूल्यों को नई पहचान दे गए। मुस्लिम शासकों के पतन और बर्तानिया हुकूमत की शुरुआत का यह समय सभ्यता के विचलन की वजह बन सकता था, लेकिन साई सांस्कृतिक दूत बनकर सामने आए। जन-जन की पीड़ा हरी और उन्हें जगाया, प्रेरित किया युद्ध के लिए। युद्ध किसी शासन से नहीं, कुरीतियों से, अंधकार से और हर तरह की गुलामी से भी! यह सब कुछ मानवमात्र में असीमित साहस का संचार करने के उपक्रम की तरह था। हिंदू, पारसी, मुस्लिम, ईसाई और सिख..हर धर्म और पंथ के लोगों ने साईं को आदर्श बनाया और बेशक-उनकी राह पर चले।

दरअसल, साई प्रकाश पुंज थे, जिन्होंने धर्म व जाति की खाई में गिरने से लोगों को बचाया और एक छत तले इकट्ठा किया। घोर रूढ़िवादी समय में अलग-अलग जातियों और वर्गो को सामूहिक प्रार्थना करने और साथ बैठकर चिलम पीने के लिए प्रेरित कर साई ने सामाजिक जागरूकता का भी काम किया। वे दक्षिणा में नकद धनराशि मांगते, ताकि भक्त लोभमुक्त हो सकें। उन्हें चमत्कृत करते, जिससे लोगों की प्रभु के प्रति आस्था दृढ़ हो। शिरडी साईं धाम में एक नीम का पेड़ है। साईं की छत्र - छाया पाकर पेड़ की पत्तियां भी मीठी हो गई है। आज साई की नश्वर देह भले न हो, लेकिन प्यार बांटने का उनका संदेश असंख्य भक्तों की शिराओं में अब तक दौड़ रहा है।

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